श्रीकृष्ण-विषयक सम्बन्ध-अभिधेय-प्रयोजन; अर्थात् साध्य-साधन तत्त्व इस गम्भीर ग्रन्थ का प्रतिपाद्य-विषय है। यह ग्रन्थ आठ प्रकरणों में विभक्त है। अद्वय तत्त्व के प्रकाश-स्वरूप—ब्रह्म, परमात्मा और भगवत्ता के आविर्भाव में श्रीकृष्ण का सर्वोच्च स्थान—यह प्रथम प्रकरण का विषय है। फिर, शक्ति, धाम, लीला एवं भाव—इन चार तत्त्वों के निरूपण के लिए चार प्रकरण हैं। अन्तिम तीन प्रकरणों में भावराज्य तथा लीला-रहस्य का विशद प्रतिपादन है। श्री राधातत्त्व, सखी-तत्त्व, कुञ्ज-निकुञ्ज-लीला, रति के स्तरभेद, जीव का स्वरूप इत्यादि अनेक रहस्यों का इसमें उद्घाटन किया गया है। श्रीकृष्ण के आगम-सम् मत तात्त्विक विवेचन एवं तत्सम्बन्धी साधना के जिज्ञासुओं और रसिकों के लिए यह ग्रन्थ परम उपादेय है। अनुक्रमणिका १. अद्वयतत्त्ïव-ब्रह्मï-परमात्मा-भगवानï्, जीव-जगत्-शक्ति २. शक्ति-धाम-लीला-भाव (क) ३. शक्ति-धाम-लीला-भाव (ख) ४. शक्ति-धाम-लीला-भाव (ग) ५. शक्ति-धाम-लीला-भाव (घ) ६. भावराज्य व लीलारहस्य (क) ७. भावराज्य व लीलारहस्य (ख) ८. भावराज्य व लीलारहस्य (ग) उपसंहार विशिष्ट-शब्दानुक्रमणी।