प्रस्तुत पुस्तक जो निजवार्ता , घरवार्ता के नाम से प्रसिद्ध है इससे आचार्य जी के चरित्र और सामर्थ्य पर काफी प्रकाश डालता है ये कहने की आवश्यकता नहीं है की निजवार्ता।, घरुवार्ता की रचना ८४ वैष्णव की वार्ता के अनन्तर ही हुई है क्युकी इसमें ८४ वार्ता के उललेख कई स्थानों पर मिलते है इसमें जो भावप्रकाश से बहुत कुछ मिलता है अतः इसके संकलन और रचना का सारा श्रेय गोस्वामी हरिराय को ही दिया जाता है
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