स्वामी अखण्डानंद सरस्वती द्वारा ‘दृग-दृश्य विवेक’ का वर्णन एक अद्वैत वेदांत ग्रंथ पर आधारित है, जो ‘द्रष्टा’ (देखने वाला) और ‘दृश्य’ (देखी जाने वाली चीज़) के बीच के अंतर को स्पष्ट करता है। यह ग्रंथ दर्शाता है कि मन एक द्रष्टा है जो शरीर और सभी इंद्रियों जैसी सभी “दृश्य” वस्तुओं का ज्ञान रखता है, जबकि आत्मा ही वह अंतिम सत्य है जो इन सभी से अलग है। यह ग्रंथ वेदांत दर्शन के निष्कर्षों को समझने के लिए महत्वपूर्ण है और आत्मा तथा ब्रह्म के बीच की पहचान पर प्रकाश डालता है।
दृग-दृश्य-विवेक का विवरण
द्रष्टा और दृश्य: यह ग्रंथ इस बात पर केंद्रित है कि देखने वाला (द्रष्टा/मन) और देखी जाने वाली वस्तुएं (दृश्य/शरीर, इंद्रियां, आदि) अलग-अलग हैं।
ज्ञान और ज्ञाता: मन ज्ञाता है और आंखें, कान, नाक आदि ज्ञात हैं। मन इन सभी की स्थिति को जानता है, और इन सभी में बदलाव होते रहते हैं, लेकिन मन अपेक्षाकृत अपरिवर्तित रहता है।
आत्मा और ब्रह्म: ग्रंथ यह समझाता है कि अंतिम सत्य, जिसे आत्मा कहा जाता है, मन और शरीर से भी परे है। यह आत्मा और ब्रह्म की पहचान पर भी प्रकाश डालता है।
आध्यात्मिक महत्व: यह ग्रंथ अद्वैत वेदांत दर्शन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो वास्तविकता को समझने और अज्ञान से मुक्ति पाने में मदद करता है।
अन्य पहलू: यह ग्रंथ समाधि के अवलोकन पर भी प्रकाश डालता है, जो सविकल्प और निर्विकल्प समाधि पर केंद्रित है।
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