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Edition : 2012
Size : 1×12 cm
Language : Hindi
Pages : 362
Binding : Paperback
Author : Dr Avadh Bihari Lal Kapoor
निवेदनइस ग्रन्थ में प्रारम्भ के कई अध्यायों में ‘भक्तिरसामृतसिन्धु’, ‘उज्ज्वल-नीलमणि’ और ‘प्रीति-सन्दर्भ’ आदि भक्ति-रस के प्रमुख ग्रन्थों के आधार पर रस के स्वरूप, सामग्री और प्रकार, रस-साधना और उसके विभिन्न स्तर और भगवत्-प्रीति के स्वरूप और स्तरादि विषयों पर प्रकाश डाला गया है। उसके पश्चात् व्रज के विभिन्न सम्प्रदायों के रसोपासना के सिद्धान्त का यथावत् निरूपण किया गया है। अन्त में उनका तुलनात्मक अध्ययन कर व्रज की रसोपासना के सामान्य रूप और उसके मूल सिद्धान्तों का आविष्कार करने का प्रयास किया गया है।मेरा विश्वास है कि व्रज के धर्म-सम्प्रदायों में भावगत भेद होते हुए भी रसोपासना के मूल सिद्धान्तों को लेकर उतना भेद नहीं है, जितना साम्प्रदायिकता के नाते उन्हें उभारने की चेष्टा की गयी है। कुछ भेद एक-दूसरे के सिद्धान्त की यथार्थ जानकारी न होने के कारण मान लिये गये हैं, जो उनका यथार्थ रूप सामने आने पर स्वतः समाप्त हो जाते हैं। कुछ भाव-भेद के कारण हैं- ‘भाव-भेद रस-भेद अपारा।’ भाव रस को विविधता प्रदान करता है, पर उसकी एकता को मिटा नहीं देता। वह उसे विभिन्न रूपों में अभिव्यक्त कर विभिन्न प्रकार से आस्वाद्य भर बनाता है।व्रज की रसोपासना के विभिन्न सम्प्रदाय एक ही रस-मंदाकिनी की विभिन्न धाराएँ हैं, एक ही रस-तत्त्व का भिन्न-भिन्न रूपों में आस्वादन करने के विभिन्न माध्यम हैं। वे सभी वरणीय हैं, सभी उत्तम हैं। जिसका जैसा भाव है, उसके लिये वैसा रूप ही श्रेष्ठ है।उपासना में प्रत्येक सम्प्रदाय का जो विशिष्ट रूप है, वही ठीक है। पर, सम्प्रदायों में एकात्मता स्थापित कर पारस्परिक सौहार्द और सहयोग बढ़ाने के लिये उनमें व्याप्त एकात्मता के सूत्रों को खोज निकालना आवश्यक है। प्रस्तुत ग्रन्थ उसी दिशा में एक प्रयास है।
विनीत :
श्रीगुरु पूर्णिमा
सम्वत् २०४१
अवध बिहारी लाल कपूर








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