Braj ki Khichdi / Vraj ki Khichdi ब्रज की खिचड़ी

Original price was: ₹299.00.Current price is: ₹220.00.

Edition : 2026

Size : 21×14 cm

Pages : 160

Binding : Paperback 

Weight : 300gm

Author : Braj Vibhuti shayamdas Ji 

 

कैसे पकी यह खिचड़ी….ब्रज की वार्ता, ब्रज की चर्चा, ब्रज की उपासना, ब्रज की प्रेरणा, ब्रज के संत आदि-आदि ब्रज विषयक छोटे-सरल किन्तु मार्गदर्शक ग्रन्थों की श्रृंखला में इक्कीसवां पुष्प ब्रज की खिचड़ी सादर, सहर्ष, सोल्लास आपके कर कमलों में प्रस्तुत है।इसका नाम आवश्यक अटपटा है लेकिन अध्यात्म से सम्बद्ध है। व्रज में सर्दियों में एक माह तक ठाकुरजी के मन्दिरों में खिचड़ी का ही भोग लगता है। जो कि परम स्वादिष्ट एवं अनेकानेक मेवे, इलायची, छुहारे, बादाम, किशमिश आदि बहुत से व्यंजनों से युक्त होती है, उसी की स्मृति हेतु इसका नामकरण उन्हीं दिनों में ही किया। छपते छपते दुबारा वही मौसम आ गया।लौकिक दृष्टि से अनेक पदार्थों के सम्मिश्रण को खिचड़ी कहते हैं। उसी दृष्टि को सार्थक करते हुए इस ग्रन्थ रत्न में भी विषयों की खिचड़ी है। किसी एक विषय पर, किसी विशेष क्रम का ध्यान न रखते हुए जो सामने आया उसे लिख दिया। लगा दिया। यद्यपि सूची में विषय चुनने की सुविधा है फिर भी आगे पीछे जैसा बन पड़ा वैसा प्रस्तुत किया। पुनरावृत्ति भी हुई है।विद्यार्थी जीवन से ही मुझे नोट्स या सार लिखने की आदत है। अब जब 2005 से अध्यात्म में प्रवेश लिया तो यहाँ भी जब भी मैंने कुछ पढ़ा या सुना उसका एक सार नोट अवश्य डायरी में नोट करता रहा। बीसियों डायरियाँ हैं। आज भी चार-चार पृष्ठ के निबन्ध कम लिखता हूँ। चार-चार लाइनों की सारगाही बातें अवश्य ही प्रतिदिन लिखता ही हूँ। और वह भी जैसा मैंने समझा – वैसा लिखता हूँ।इन छोटी-छोटी बातों को हरिनाम एवं अन्य ग्रन्थों में भी फिलर्स के रूप में प्रकाशित करता रहा। पाठकों को भी ये फिलर्स लेख से अधिक पसन्द आते हैं। मुझे आशीष भी मिला इन वाक्यों को लेकर। इसी उत्साह में आकर इन्हें ग्रन्थ रूप में संकलित किया। साथ ही आज सोशल मीडिया, वाट्सअप द्वारा भी भक्ति भजन का प्रचार बढ़ रहा है और प्राथमिक लेवल के साधक बहुत डीप नहीं जाना चाहते हैं और न जा सकते हैं। उन्हें भक्ति की एबीसीडी चाहिये होती है। न ही उनके पास चार पृष्ठ का निबन्ध पढ़ने की रुचि व समय होता है। वे साधक इन वाक्यों से बहुत प्रभावित होते हैं और उनका मार्ग प्रशस्त होता है।कहने को तो ये प्राथमिक साधकों के लिये हैं, लेकिन कभी-कभी स्तरीय साधक को भी ‘नाविक के तीर की भांति गम्भीर घाव’ कर जाते हैं। इस ग्रन्थ में हजारों में से कुछ प्रस्तुत हुए हैं। शीघ्र ही ‘ब्रज की खीर’ नामक आगामी पुष्प में कुछ और खट्टे मीठे वाक्यों का सार आपकी सेवा में प्रस्तुत करूँगा। साथ ही आज भी लेखन अनवरत है। लिखता रहूँ। छपता रहे। आप पढ़ते रहें। बढ़ते रहें। मैं आपका अनुगत्य करता रहूँ। ये क्रम कभी न टूटे-इसी आशा वास में ग्रन्थ सेवारत जय श्री राधे के उद्घोष के साथ सदैव आपका-दासाभास डॉ गिरिराज
एमए, पी-एचडी, साहित्यरत्न, सम्पादक शिरोमणि
प्रधान सम्पादक : श्रीरजिनाम मासिक

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