काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से 1991 में सेवानिवृत्त होने पर मैंने पहला विपश्यना शिविर जून 1991 में किया जिसने मेरे ज्ञान चक्षु खोल दिये। निरन्तर अभ्यास एवं 60 दिन तक के दीर्घ शिविर करते-करते मुझे शुद्ध धर्म के व्यावहारिक पक्ष पर चलने का प्रशस्त राजमार्ग मिल गया। इसी से प्रेरित होकर एवं पूज्य गुरुजी कल्याण मित्र गोयनका जी की मौखिक अनुमति प्राप्त कर उनके विचारों, प्रवचनों एवं लेखों से प्रभावित समय-समय पर मेरे लेख दैनिक पत्रों एवं पत्रिकाओं में छपते रहे हैं। इसमें कुछ भी मेरा नहीं है। इसमें कुछ सामग्री विपश्यना पत्रिका से भी संकलित की गयी है। यह सोचकर कि शायद इन्हें पढऩे से किसी पाठक को कोई प्रेरणा मिले और वह अध्यात्म के सही स्वरूप के विषय में सोचे और समझे, इन आलेखों को पुस्तकाकार रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। अध्यात्म तो अपने अन्तरमन में झाँकना है। कितने विचारों का संचय हमने कर रखा है। उनसे कैसे मुक्ति मिले, कैसे मन निर्मल बने। यदि यह पुस्तक एक भी व्यक्ति को अध्यात्म के मार्ग पर चलने हेतु प्रेरित कर सके तो इसे मैं अपना सौभाग्य मानूँगा और इस पुस्तक की सार्थकता सिद्ध हो सकेगी।
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