Virahini Vishnu Priya / Virahini Vishnupriya / विरहिणी विष्णुप्रिया

Original price was: ₹349.00.Current price is: ₹230.00.

Edition : 2026

Size : 21×14 cm

Pages : 136

Binding : Paperback

Language : Hindi 

Author : Dr . Avadh Bihari Lal Kapoor 

काहे को पिय पियहिं रटत हौ, पियकौ प्रेम तेरो प्रान हरैगौ।
कुछ लाइन इसी पुस्तक से  …….

काहे को लेत नयन-जल भरि-भरि, भरे ते कैसे फूल टरैगौ॥
काहे कौं स्वाँस उसाँस लेति हौ, बैरी विरह कौ दावा जैरैगौ।
छार सुगन्ध सेज पुहुपावलि, हारु छुए तें हिय हारु जैरैगौ॥
बदन दुराइ बैठि मन्दिर मैं, बहुरि निसापति उदय करैगौ।
सूर सखी अपने इन नैननि, चंद्र बिये जिनि, चन्द्र जैरैगौ॥_ _कोऊ ब्रज बांचत नाहिंन पाती।
कत लिखि-लिखि पठवत नन्द-नंदन, कठिन विरह की काती॥
नयन सजल, कागद अति कोमल, कर अंगुरी अति ताती।
परसत जरै, बिलोकत भीजति, दुहूँ भाँति दुःख छाती॥पर प्रभु के विरह में जो बाहर से दुःख जैसा प्रतीत होता है, वह दुःख नहीं सुख ही होता है। विरह भी प्रेम की ही एक अवस्था है, जो स्वरूप से आनन्दमय है। उसे दुःख उसी प्रकार स्पर्श नहीं करता, जिस प्रकार प्रकाश को अन्धकार स्पर्श नहीं करता। उसमें जो रोदनादि होता है, उसे उसी तरह प्रेम का अनुभाव माना गया है, जिस प्रकार नृत्यगानादिको प्रेम का अनुभाव माना गया है। उसमें दुःख होता यदि प्रेमास्पद का वास्तविक वियोग होता। वास्तव में उसमें वियोग नहीं होता। उसका दूसरा नाम है—विप्रलम्भ। ‘विप्रलम्भ’ का अर्थ है प्रकारान्तर से प्राप्ति। विप्रलम्भ में बाहर इष्ट का अमिलन रहता है। पर अंतस्थल में उसकी सम्यक् प्राप्ति हुई रहती है। विप्रलम्भ का मिलन और भी निबिड़ होता है। सम्भोग में शरीर का शरीर से, इन्द्रियों का इन्द्रियों से ही मिलन संभव है, विप्रलम्भ में मन का मन से, प्राण का प्राण से मिलन होता है। इसलिए विप्रलम्भ को संभोग-पुञ्जमय कहा है। सम्भोग में इष्ट के एक ही रूप का अनुभव होता है, विप्रलम्भ में विश्व इष्टमय होता है। इसीलिए विप्रलम्भ में दुःख नहीं सुखपुंज होता है।दिव्य प्रेम का स्वरूप ही ऐसा है कि वह कभी प्रेमास्पद का वियोग नहीं होने देता। श्रीविश्वनाथ चक्रवर्ती ने लिखा है कि यह चुम्बकी भाव प्राप्त श्रीकृष्ण को आकर्षित कर कृष्ण-भक्त के निकट ले आता है। इतना ही नहीं, प्रेम श्रीकृष्ण को धाम और लीला सहित भक्त के निकट प्रकट कर देता है। (माधुर्यकादम्बिनी, अष्टम वृष्टि)।

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