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Edition : 2025
Size : 21*14 cm
Pages : 547
Binding : Paperback
Weight : 550 gm
Authour : स्वामी करपात्रीजी महाराज (Swami Karapatri ji Maharaj)
“गोपी गीत (दार्शनिक विवेचन)” (Gopi Gita – Philosophical Discourses) अनन्तश्री स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा श्रीमद्भागवतम् के गोपियों के विरह-प्रेम पर दिए गए प्रवचनों का एक गहरा दार्शनिक संकलन है। यह पुस्तक गोपी प्रेम को अद्वैत वेदान्त और भक्ति के सर्वोच्च शिखर के रूप में प्रस्तुत करती है।स्वामी करपात्री जी महाराज भारत के शीर्ष कोटि के संन्यासी, मीमांसक और अद्वैत वेदान्ती थे। “गोपी गीत” के इस दार्शनिक विवेचन में उनके दृष्टिकोण की मुख्य बातें निम्नलिखित हैं:भक्ति और ज्ञान का समन्वय: स्वामी जी ने गोपियों के विरह को साधारण प्रेम नहीं, बल्कि उस सर्वोच्च आध्यात्मिक अवस्था (अद्वैत निष्ठा) के रूप में व्याख्यायित किया है जहाँ भक्त और भगवान के बीच का भेद समाप्त हो जाता है।श्रीमद्भागवतम् का सार: गोपी गीत (भागवत के दशम स्कंध का 31वां अध्याय) को वेदान्त का सार माना गया है। करपात्री जी ने इसके प्रत्येक श्लोक का अर्थ निकालकर उसे अद्वैत दर्शन, भक्ति रस और मीमांसा के परिप्रेक्ष्य में समझाया है।साधना की पराकाष्ठा: इस पुस्तक में यह स्पष्ट किया गया है कि गोपियों की तन्मयता, जिसे लौकिक दृष्टि से ‘काम’ या ‘मोह’ समझा जा सकता है, वास्तव में ईश्वर में पूर्ण विलय (परम प्रेम) है।संकलन: इन प्रवचनों को व्यवस्थित रूप देने का कार्य श्रीमती पद्मावती झुनझुनवाला द्वारा किया गया था।








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